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Wednesday, 8 February 2012
डून..डून..डैरा-डैरा..डून
आज से कई प्रकाश-वर्ष पूर्व ये अद्भुत रचना कबाड़खाने पे सुनी गई थी । आज विडियो मिल गया इत्तेफ़ाक़ से । स्वामी जॉर्ज हैरिसन का गाया ये गीत रिलीज़ नहीं हुआ कभी मग़र मिलता है अब भी दून- प्रेमियों के पास । क्या आप नहीं सुनेंगे--
Wednesday, 14 April 2010
मयखाने में 'डाकिया डाक लाया....'
लिखने वाले ने लिखा हम क्या लिखें ऐसे गीतों के बारे में । बस देख -सुन कर खुश हो लेते हैं और ब्लॉग -जगत में इन्हें बाँटनें का मकसद अपने हम-ख़याल दोस्तों को ढूंढना होता है । अगर ये गीत आपके दिल को ई-मेल के ज़माने में छू जाता है तो आप-हम हमखयाल हुए न .......हुए कि नहीं ? गाने के एक-एक लफ्ज़ में कुछ है ...कुछ तो है ...आखिर लिखा गुलज़ार ने है । सन ७७ ' में आई थी 'पलकों की छाओं में ' उसी का है !
Tuesday, 23 March 2010
ये है असली मनाली
यूं तो मनाली की कहानी आदि-पुरुष मनु से जुड़ी है मग़र मनाली का जो रूप आज दिखाई देता है वो शहर तो तब बसना शुरू हुआ जब कश्मीर में आतंक की दूकान खुलने के बाद वहां पर्यटन ठप्प पड़ने लगा और बाबू लोगों ने हिमाचल का रुख किया । दरअस्ल, मनाली शहर जिस गाँव के नाम पर बसा है वो आज भी जस का तस है और बाबू वर्ग से अछूता है । इतना ज़रूर है कि कुछ जर्मन और स्वीड यहीं की लड़कियों से शादी करके यहाँ बस गए हैं और हिंदी बोल कर निपट ग्रामीणों की तरह मोटर-साईकिल पर दूध की सप्लाई करते घूमते हैं । यही नहीं पशुओं की न्यार-सानी और चारा-पानी भी देसी तरीके से करते हैं । असल में यहाँ आसानी से उपलब्ध चरस भी उनके लिए एक बड़ा आकर्षण है। मैं कोई तीन बरस पहले गया था वहां विडियो कैमरे के बगैर! मग़र आज ये विडियो हाथ लगा है सो आप भी देखें क्या हर्ज़ है ?
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