"....i hate tears pushpa...i hate tears..."
ये मेरी यमुनोत्री की दूसरी यात्रा थी । इस से पहले कोई छः वर्ष हुए तब यहाँ आना हुआ था । तब की तुलना में चढाई का 5 किलो मीटर का रास्ता बहुत साफ़-सुथरा और पक्का दिखा , खड़ी चढाई मगर अब इसे ट्रेक्किंग जैसा नाम नहीं दिया जा सकता । जगह-जगह बेंच लग गए हैं , पीने का पानी भी है । कुछ वर्ष पहले ये १४ किलो मीटर की कठिन चढाई थी अब तो कुछ भी नहीं मगर फ़िर भी अच्छी मशक्कत तो है ही । सरकार ने साफ़ -सफाई का इन्तज़ाम किया है मगर प्लास्टिक पर कोई बस नहीं । लोग भी समझने को तैयार नहीं सो किया क्या जाए सिवा इसके की इस मुद्दे पे एक अलग पोस्ट छापी जाए मगर फिलहाल बात संत राम भरोसे दास की । नाम के ही अनुरूप राम का भरोसा लिए एक सच्चे संत । आज यमुनोत्री के पट बंद हो गए , पण्डे -पुजारी सब विदा , मन्दिर -दुकानें सब खाली । अब वहां कोई हैं तो बस यही संत । स्थानीय ग्रामीणों का कहना है की सन् ६७ से ये यहीं बिराजते हैं चाहे कितनी बर्फ पड़े या तूफ़ान आयें । उन्हें इस तरह रहते देख अब भक्त जनों ने गुफा को मन्दिर का रूप दे दिया है , कुछ कमरे बनवा दिए हैं । न तो किसी को बुलाते हैं ,न कुछ चढाने को कहते हैं और न ही रत्ती भर अपेक्षा रखते हैं बस हरि भजन करते हैं । बड़ी मुशकिल से फोटो खेंचने दी । ६ साल पहले इस ८४ वर्ष के साधक को मैंने झुर्रियों भरे ,साँवले से चेहरे के साथ देखा था जबकि अब रंग और त्वचा का रूप बिल्कुल बदला हुआ था । जड़ी -बूटी का अच्छा ज्ञान रखते हैं और आग्रह करने पर दे भी देते हैं । कभी जाना हो तो दर्शन कर लें , चैनल वाले बाबा तो देखते ही रहते हैं । हम एक रात ऊपर रहे और फ़िर जानकी - चट्टी से बाइक उठा कर घर की राह ली । जो ब्लौगर इस यात्रा-वृत्त को पढ़े-पढाएगा उसका कल्याण होगा ऐसा मेरा कुछ-कुछ मानना है , तो गाओ ॐ शांती ॐ........... !
यमुनोत्री मार्ग का असल मज़ा बड़कोट और जानकी -चट्टी के बीच है । जानकी -चट्टी से चढाई शुरू होती है सो उसका अलग अनुभव है मगर प्राकृतिक -सुषमा का जो आनंद इस मार्ग में है उसका वर्णन क्या किया जाए बस चित्र देख कर ही आप समझ जायेंगे ! करीब ४० किलोमीटर का ये फासला बड़े मज़े से रुकते -रुकाते पूरा किया । उस दिन दो अक्टूबर का दिन था और इस सुदूर अंचल में महात्मा गांधी की जय बोलते बच्चे बड़े प्यारे लग रहे थे सो उनका एक छोटा सा विडियो भी हमने उतार लिया । आने वाली सर्दी की तय्यारी में आलू इकठ्ठे करते और सब्ज़ी सुखा कर रखते ग्रामीण यूँ ही हाथ उठा कर जय राम जी की बोल देते तो दिल भर आता कि हम आख़िर इनके क्या लगते हैं ! प्रकृति के सान्निध्य ने इनके हृदय शुष्क नहीं होने दिए हैं . पुण्य-सलिला यमुना के उदगम के निकट वर्ती ग्रामीणों को मैं नमस्कार करता हूँ ,वंदन करता हूँ देवभूमि उत्तराखंड का और मनाता हूँ के इसे किसी की नज़र न लग जाए ।
"मौज दो ,मौज लो ,न मिले तो खोज लो " के स्वतः -स्फूर्त सिद्धांत का अनुगमन
करती हमारी फट-फटिया ८०-९० की रफ़्तार से भागी जा रही थी ,मगर कालसी के बाद चढाई
शुरू हुई तो गति धीमी कर लेनी पड़ी यही कोई २५-३० के आस-पास ! हर मोड़
हैरान कर देने वाला था . कहीं बीच सड़क पे झरने झर रहे थे तो कहीं अचानक गूजरों
की टोलियाँ नमूदार हो जाती . अपनी भैंस और बकरियों को चराते ये गूजर सड़क के बीचों बीच
पसरने से भी परहेज़ नहीं करते और आने-जाने वालों की जान सांसत में डाले रहते हैं।
। बहरहाल, गूजर बालक फुंदने वाली टोपियाँ पहने फुदकते बड़े भले मालूम देते थे . हिमाचल प्रदेश की तुलना में उत्तराखंड की कानून -व्यवस्था निस्संदेह लचर है चूंकि सड़क के किनारे से गुज़रती प्रत्येक नवयुवती गंडासा या दरांती लिए ही दिखाई देती थी । गंगोत्री और बद्रीनाथ के उलट यमुनोत्री -मार्ग का कोई रण-नीतिक महत्त्व नहीं है और इसीलिए उसकी हालत भी लचर है मगर कुदरती नज़ारों के आगे सारी शिकायतें बेकार मालूम देती थीं . बेशक सड़क को कई जगह से दुरुस्त भी किया जा रहा था मगर इस से रास्ता और संकरा हो गया था .ज़्यादा धचके लगने से बाइक का एक सामने का शौकर जवाब दे चुका था और पीछे टंगा बैग टायर से रगड़ खाकर किनारे से कुछ फटने लगा था ।डाक- पत्थर,कालसी जुड्दो , नैनबाग, नैनगांव, दामता, कुआँ और नौगाँव से होते हम बड़कोट पहुँच चुके थे । जहाँ पहले दिन हमने आराम से ३०० किलोमीटर से कुछ ऊपर बाइक खेंच ली वहीं आज १००
किलोमीटर में ही पिछवाड़े की चूलें हिलने लगीं सो बाइक रोक कर गढ़वाल मंडल विकास निगम का कमरा कब्ज़ाया गया । यहाँ रेट १५० रूपइए मात्र प्रति बिस्तर था जो किसी फाइव स्टार के १५,००० वाले बिस्तरे से भी ज़्यादा गुदगुदा और आरामदेह था ! रात यहीं बिताने की ठहर हुई और बैग को अगली सुबह की खातिर ठीक से बाँध कर छोड़ दिया ! see video also.
Trusting in God will not make the mountain smaller, but will make climbing easier.
Do not ask Him for a lighter load, ask for stronger back.