Monday, 12 March 2012

जुगलबन्दी राजेश जोशी(बीबीसी) और तिगमांशु धूलिया की

फ़िल्म तो जो है सो है ही । हिन्दी में इससे सशक्त कोई राजनीतिक और सामाजिक टिप्पणी पिछले 20 साल में तो कम से आई नहीं । लेकिन, जैसे फ़िल्म में एक कहानी के ज़रिए कहानी के बाहर भी सब कुछ कह दिया गया है ये इंटरव्यू भी फ़िल्मी बातचीत के ज़रिए बहुत कुछ कह जाता है - हिन्दी सिनेमा का अर्थशास्त्र, क़स्बे, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की खूबियाँ और खामियाँ, मुंबई मेन-स्ट्रीम सिनेमा की मानसिकता , खिलाड़ियों की हालत यानि कुछ नहीं छोड़ा है । तिगमांशु जैसे आदमी को ये कहते सुनना वाक़ई एक अनुभव है कि वो आज भी एक आउटसाइडर हैं । ख़ैर,बहुत कम होता है जब ऐसा ऑडियो इंटरव्यु सुनने को मिलता है । अगर पान सिंह तोमर आपने देख मारी तो इस गुफ़्तफ्तगू को क़तई मिस ना करें और नहीं देखी तब तो हरगिज़-हरगिज़ ना करें । क़सम उड़ान झल्ले की मज़ा आ जायगा बस क्लिकियावें और मौज पावें ----

Friday, 9 March 2012

11.03.11 - यादें दुनिया के सबसे ख़ौफ़नाक ज़लज़ले की

जापान की राजधानी तोक्यो में एक विशाल इमारत की छठी मंज़िल के जिस हॉल में बैठना होता है उसमें दुनिया भर के दीगर मुल्कों के बाशिंदे बैठते हैं । पीछे थाईलैंड वाले हैं , बगल में वियतनाम, म्यामां और इंडोनेशिया हैं और फिर चीन, रूस , स्पेन, फ्राँस, अरब, ईरान, अफ़्रीका वगैरह-वगैरह की कतारें चलती चली गई हैं । ठीक सामने पाकिस्तान है जिस पर मेरे समकक्ष जनाब जाफ़र साहब की चौकी है । बलोचिस्तान के बाशिंदें हैं । खास बातचीत नहीं थी क्योंकि करगिल का मैं गवाह हूँ ।
बहरहाल, दोपहर के क़रीब पौने दो बजे जब उसने दस्तक दी तो उस पल सबसे पहला जो अहसास हुआ वो समंदर में लंगर डाले इकलौते जहाज़ का है जिसमें मैं कभी सवार हुआ हूँ । योकोहामा की खाड़ी में ये विश्वयुद्धकालीन जहाज़ -हिकावा मारू- अब भी खड़ा है जस का तस जिसे मैं कुछ दिन पहले देख कर आया था और लहरों की थरथराहट का जो अहसास उसके सबसे नीचे एंजिन वाले तल्ले में था कुछ वैसा ही अहसास..बस । वो विशाल हॉल मानो लहरों पे धरा था ।
खिड़कियाँ बजी तो नहीं लेकिन उन पर पड़ी वेनेशियन ब्लाइंड्स और उन्हें खींचने वाले तारों का हिलना, हर डेस्क पर छत से लटकी नेम प्लेट्स का हिलना और फिर दरवाज़ों की चूलें हिलने का अहसास जो लगातार बढ़ता जा रहा था । शुरू में कोई खास सुगबुगाहट नहीं लेकिन फिर चेहरों का रंग उड़ना, माथे पे छलछला आए पसीने और डेस्क के नीचे हो जाने की घोषणा । दो मिनट में टेलिविज़न तस्वीरें दिखाने लगा था और आठ दशमलव कुछ के भूकंप का फ़्लैश आने लगा था जो कई रोज़ बाद संशोधित होकर नौ रहा बताया गया । बहरहाल क़रीब पाँच या छः मिनट का वो वक्फ़ा सदियाँ बन कर गुज़रा । मैं अपनी कुर्सी पर ही था याद करते हुए कि अंत समय में ईश्वर को याद करो तो भी जनम भर के पाप खतम लेकिन ईश्वर को मेज़ के नीचे भी याद किया जा सकता था फिर मैं क्यों बैठा रहा ऊपर-ऊपर से मुस्कुराते और क्यों मेरे सामने जाफ़र साहब भी मुस्कुराते बैठे थे ? ये हमें उस वक्त ख्याल नहीं आया लेकिन जब वो दौर थमा और हमने पाया कि हम दो ही बैठे हैं तो हँसते हुए गले मिले और कहा कि अब तो नीचे चलें ।
नीचे उतरते ही देखा समुराई योद्धाओँ की पोशोकों में खड़े कुछ लोग बतिया रहे थे जो किसी टीवी ड्रामा की शूटिंग रोक बाहर निकल आए थे , हैलिकॉप्टर उड़ान भर रहे थे , हैल्मेट धारी रक्षा दल हरकत में आ चुके थे और अभी त्सुनामि की प्रलयलीला का सीधा प्रसारण बाक़ी था । बहरहाल, मैंने उनसे पूछा नहीं कि आप क्यों मेज़ के नीचे नहीं हो गए क्योंकि मैं जानता था कि उनका जवाब वही होगा जो मेरा लेकिन सारी दुनिया के बाशिंदों के बीच इस अनुभव ने हमें क़रीब तो ला ही दिया था । बहरहाल, उसके बाद जो कुछ हुआ वो आप सबने देखा । पूर्वोत्तरी जापान में समंदर सब कुछ लील गया था । मकान, जहाज़, बिजली के ट्राँसफ़ार्मर , गाडियाँ, हैलिकॉप्टर सब कुछ ऐसे उछाला जा रहा था जैसे बच्चे खिलौनों को फ़ेंकते हैं । लेकिन उसी इलाक़े में दौड़ती हुई 37 बुलट ट्रेन्स अपने सेंसर्स की बदौलत जाम हो गईं थीं और किसी का बाल बाँका नहीं हुआ ।
तोक्यो शहर में भूकंप क़रीब 7 के आसपास बताया गया लेकिन सबसे बड़े फैशनेबल और भीड़ भरे इलाकों में शुमार शिबुया में मुझे कोई अफ़रा-तफ़री नहीं दिखी सिवा इसके कि लोग तबाही के दृश्य रात के दो बजे भी सड़कों के किनारे लगी स्क्रीन्स पर देख रहे थे और स्मोकिंग ज़ोन की बजाय आज सड़क पर ही सिगरेट पी रहे थे... बस । तबाही का मंज़र लाइव टेलिकास्ट हो रहा था सड़कों के किनारे लगे विशाल टीवी स्क्रीन्स पर, लोग देख रहे थे लेकिन बिल्कुल ख़ामोशी पसरी थी हर तरफ़ । तोक्यो से महज़ सौ किलोमीटर पर ओशिमा द्वीप में भयंकर तबाही हुई और सेंदाइ, मियागी, फ़ुकुशिमा तो आपने देखे ही हैं । तोक्यो में रहने वालों के परिवार , नातेदार इन इलाक़ों में उनकी आँखों के सामने काल के गाल में जा रहे थे लेकिन सब उस अनुभव को ज़हर का घूँट-घूँट कर पी रहे थे और ये टीवी पर दिखने वाले दृश्यों से कई गुना खौफ़ज़दा मंज़र था । जहाँ-जहाँ पानी की मार हुई कुछ बचा नहीं । फ़ोन तो भूकंप आते ही ठप्प हो चुके थे मगर फ़ेसबुक, ट्विटर और जी चैट से काम बराबर चल रहा था । ट्रेनें ठप्प थीं । लोग लाइऩों में खड़े इंतज़ार कर रहे थे और कुछ अखबार बिछा कर स्टेशनों पर ही पसर गए थे । कोई धक्का-मुक्की , कोई शोर-शराबा नहीं । शाम के छः बजते-बजते स्टोर्स से सामान गायब होने लगा था और ये स्थिति अगले कई दिन तक रही और फिर परमाणु बिजली घरों में विस्फोट, विकिरण और दूषित जल जल की अफ़वाहों का दौर जो अब भी जारी है। उस रात , मैं भारी भीड़ के बावजूद रात के ढ़ाई बजे आराम से ट्रेन पकड़ कर घर पहुँचा । खुदा ना करे दिल्ली में छः का भी आ जाए !
घर में अलमारियों के पल्ले खुले हुए थे और आफ़्टर शेव लोशन की एक खाली शीशी वॉशबेसिन में गिरी पड़ी थी, मेज़ घड़ी और टेलिफ़ोन सरक कर किनारे आ चुके थे और गिरने से बाल-बाल बच गए थे ।अपनी टैक्नोलॉजी के बल पर जापान ने दुनिया के सबसे भयंकर भूकंप को जीत लिया था लेकिन समंदर पर किसका ज़ोर है और अगर ज़मीन ही पैरों के नीचे से फ़ट कर सरक जाए तो किसके कल्ले में ताक़त है जो उसे रोक ले । लेकिन जिस तेज़ी से जापान ने इस महाआपदा का मुँह तोड़ जवाब दिया है वो बताता है कि जीना और मरना जैसा जापानी जानता है उसके लिए एक सैल्यूट तो बनता ही है ।सारी दुनिया ने ऐलान कर दिया की जापान अब खत्म हो चुका है और अगले दिन फ्राँस के मशहूर अखबार ला मोंद की हैडलाइऩ तो अक्षरशः यही कहती थी लेकिन जापान अब भी वहीं खड़ा है, खत्म अमरीका हो रहा है । बहरहाल... भूकम्प को टैक्नॉलजी जीत सकती है लेकिन मौत को नहीं ।

Tuesday, 21 February 2012

मयख़ाने में भंभलभूसा

ईर कहिन हम ब्लॉग बनाएँ,
बीर कहिन हमहूँ बिलॉग बनाएँ,
फ़त्ते कहिन हमहूँ बिलौग बनाएँ
हम कहा हमहूँ ब्ला....ग बनाएँ,
ईर बनाए एक ब्लाग,
बीर बनाए दुई ब्लाग,
फ़त्ते बनाए तीन बिलौग
हम बनाया......... भंभलभूसा!! इसीलिए यहाँ मुलाहिज़ा फ़रमाएँ ये अनूठी जुगलबंदी--

Thursday, 16 February 2012

मयख़ाने में ऊँचे लोग

के. बालचन्दर के उपन्यास मेजर चंद्रकान्त पर आधारित इस हिन्दी ब्लैक एंड व्हाइट का तक़रीबन सारा क्रू दक्खनी है , डायरेक्टर बंगाली है । मुख्य भूमिकाओं में सीमान्त प्रान्त का एक, मध्य प्रदेश का एक और बंगाल का एक है । चलती हुई ख़नकदार हिन्दी का क्या तो इस्तेमाल है । प्रेम कहानी का सिर्फ़ एक रेफ़रेंस भर है। इस क्राइम-थ्रिलर में महज़ एक अदाकारा फ़्लैशबैक में शायद कहीँ दिखती है ...असल में ये सिर्फ़ और सिर्फ़ नायकों की फ़िल्म है । यहाँ अशोक कुमार का एक अलग ही रूप दिखता है एक अन्धे मेजर का जो बर्मा फ्रंट की लड़ाई के हैंग ओवर में है ...देख नहीं पाता लेकिन अब भी वर्दी में रहता है अपने दो बेटों के साथ । उसूलों की लड़ाई की ये कहानी जाने कब देखी थी ? कैसी-कैसी नायाब फ़िल्में बनी हैं एक ज़माने में ! जब राजकुमार ने जानी कहना सीखा भी ना था और आज फिर देखने लायक़ है इसलिए कि ये बताती है कि आज हमारी हिन्दी को हिन्दी भाषियों ने ही क्या बना दिया है......

Wednesday, 15 February 2012

माया दरपन

संझा के झुटपुटे में दफ़्तर से हुक्का पानी के लिए निकलता एक शख़्स कभी-कभी सोचता है के जाने किस मायालोक में है । कैमरा वही तोशिबा टी005 , वही जो मोबाइल कनेक्शन के साथ मुफ़्त मिला करता है । माल-ए-मुफ़्त, दिल-ए-बेरहम...दिल का ऐतबार क्या कीजे ....

Saturday, 11 February 2012

ये जो जापान है...

सोनी का टेलिविज़न, तोशिबा का लैपटॉप, असाही की बीयर,पैनासॉनिक की प्रसाधन सामग्रियाँ , तोयोता की कार, सेको की घड़ी, कैसिओ का म्यूज़िक प्लेयर,शिन्कान्सेन बुलेट ट्रेन , यामाहा की मोटरसायकल और होंडा का स्कूटर ये सब मिलकर जापान को बनाते हैं लेकिन क्या यही जापान है ? क़तई नहीं , साहब ये तो महज़ सामान है ! खुद मौत भी जिसकी जिजीविषा पे हैरान है वो ...हौसला और हिम्मत उसका नाम जापान है । तस्वीरों की ज़ुबानी आज के जापान की कहानी-

Thursday, 9 February 2012

जॉर्ज हैरिसन की रचना गोविन्दाम् आदिपुरुषाम्.....

चचा कैते भये के अय ज़ाहिद महजिद में पीन दे या के वो जगै बता झाँ पै खुदा ना हो । उनकी एप्लीकेशन रिजेक्ट हो गई तो मैंने सोचा क्यों ना मयख़ाने में भजन-कीर्तन का आयोजन रक्खा जाय क्योंकि एक तो महजिद- मंदर पहले ही पवित्र हैं , ज़रूरत तो इस कमबख़्त मयख़ाने को है और मज़े की बात यहाँ किसी पट्ठे की परमीशन भी चाहिए नहीं । स्वामी जॉर्ज हैरिसन की 1969 में संगीतबद्ध इस पवित्र रचना के श्रवण से शांति प्राप्ति के चान्स बनते हैं -- गोविन्दाम् आदि पुरुषाम् त्वमाहाम् भजामि..