Tuesday, 23 February 2010

मयखाने में मित्रां नूं शौंक हथियारां दा

हर साल दिल्ली के प्रगति मैदान में सजने वाले अंतर-राष्ट्रीय हथियार मेले(defex'po २०१०) में इस बार मेरी मुलाक़ात सिद्धार्थ उर्फ़ संदीप मल्कानिया से हुई IIMC का ये होनहार लड़का इन दिनों रक्षा-विश्लेषण सम्बन्धी वेब साईट www.8ak.inके लिए काम कर रहा है उस से मिल कर मुझे उस यमुनोत्री यात्रा की सारी यादें ताज़ा हो आयीं जो पिछले अक्टूबर में हमने मोटर -साइकिल पे की थी दुनिया भर के प्रमुख हथियार निर्माता जैसे लॉक -हीड मार्टिन, वेस्टलैंड ,ग्रिप्पन , कोल्ट, यूरो-फाइटर , बोईंग , लार्सन-टूब्रो और अपने भारतीय DRDO भी यहाँ पूरे जोशो-ख़रोश से जमे थे पूरे माहौल में इन मौत की मशीनों के साथ डिस्प्ले -डेस्क पे हसीं लड़कियों और बिज़नस सूट वाले गोरों की मौजूदगी माहौल को कुछ ऐसा लुक दे रही थी जिसके लिए कोई अलफ़ाज़ मुझे नहीं मिल पा रहे हैं कुल मिला कर माहौल कार और व्यापार मेले की तरह उद्दंड और पुस्तक मेले की तरह सुस्त नहीं था और हर चीज़ बड़ी शालीनता और करीने से समझाई जा रही थी ।धुआं फ़ैलाने वाले बम्ब , माइन- स्वीपर और बुलट-प्रूफ शील्ड से लेकर विमानों और स्पाई -एयर क्राफ्ट तक सभी कुछ ताक़त के लिए इंसानी हवस की कहानी बयान करता था . बहरहाल , ज़्यादातर हर जदीदो-तरीन टेक्नोलॉजी सबसे पहले फौजी कामों के लिए विकसित होती है और फिर सिविल यूज़ के लिए मसलन ये मोबाइल फोन, विंड-चीटर जैकट,शीत-रोधी टेंट , तीव्र दर्द-निवारक गोलियां , सुपर- कम्प्यूटर और हिडेन -कैमरे वगैरह तक पहले-पहल सिर्फ फ़ौज के इख्तियार में थे . बस यही वजह है कि मैं ये मेला देखने ज़रूर जाता हूँ ! संदीप ने कुछ फोटो खेंचे और इसी वजह से ये पोस्ट लिखने का भी बहाना बना

4 comments:

  1. मित्रां नू शौक हथियारां दा, इक झाका बांकियाँ नारा था।

    रोचक रही यात्रा, बाहर लिखा था कि नहीं कमजोर दिले अंदर न आएं।

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  2. ले अंतर-राष्ट्रीय हथियार मेले के बारे में जानना, फोटो और विडियो पसंद आया.

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  3. हथियार मेला??
    इसकी जानकारी नही थी अभी तक मुझे.

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