

पहाड़ संबंधी आम बातों का सिलसिला आगे ले जाते हुए कांव -कांव पब्लिकेशन लिमिटेड के मालिक ब्लौगर 'अपूर्ण' ने अपनी टिप्पणियों के ज़रिये उनमें इज़ाफा किया है --
1:युवक काम की तलाश में शहरों का रूख करते हैं , और घर पर रहते हैं माँ-बाप, पत्नी , बच्चे | पहाड़ों में बूढ़े, बच्चों और महिलाओं का प्रतिशत युवाओं से कहीं ज्यादा है | एक कहावत , पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के ही काम नहीं आती |
2:आज , पहाड़ी अपनी ही जमीन पर बने होटलों में बैरों का काम करता है | पहले कभी, पहाड़ियों को हमेशा फौज का लोलीपोप चूसने को दिया गया, गोया वे और कुछ नहीं कर सकते हों |
3:हम ११ चचेरे भाइयों में से २ कंप्यूटर प्रोग्रामर हैं | एक पंडिताई का पुश्तैनी राग अलाप रहा है | बाकी ८ या तो होटल में काम करते हैं , या सपना पाल रहे हैं | ये पहाड़ के हर घर की कहानी है |
पहाड़ संबंधी मेरा ज्ञान सिर्फ एक यात्री जितना है सो उनकी इन बातों को आपसे साझा करना बनता था । यदि पहाड़ संबंधी कुछ और बातें आप यहाँ बांटना चाहें तो स्वागत है ।
मैंने बतौर ब्लौगर गंभीर विषयों पर लिखने से शुरुआत की , मग़र ब्लौग-जगत का टोटल मिज़ाज और कैफ़ियत टटोलने के बाद अपनी खुशी से यू-ट्यूब पे उतर आया और आज मैं "सफल ब्लौगर''न सही काफी खुश ब्लौगर ज़रूर हूँ । मैं ब्लौग पे मस्त-मस्त गाने बजाता हूँ और जो ऐसा नहीं करते उनपे तरस खाता हूँ । असल में ब्लौगिंग मनोरंजन के एक नए साधन से बढ़ कर कुछ नहीं और ये प्रिंट की जगह कभी नहीं ले सकती . ज़रा देखिये शुरू में मैं क्या लिखता था ! 'आग का दरिया' शीर्षक से प्रकाशित ये पोस्ट 13 अगस्त ,२००८ की है । मैंने जो तब कहा था वो भारत के रणनीति -विशेषज्ञ अब खुल कर कह रहे हैं .........
'आग का दरया' ये हमारे यहाँ की मशहूर नाव्लिस्ट कुर्तुलुन आपा के नाविल का भी नाम है जिसे एक ज़माने में गियान पीठ अवार्ड से नवाज़ा गया । नाविल में ज़ाहिर है 'आग का दरिया ' एक सिम्बोलिक इमेजेरी है ,मगर एक असल आग का दरया भी है जिसका के नाम दर्याए -सिंध है जो इस नक़्शे में एक नीली लकीर खेंच के दिखाया गया है । अगर आप अक़ल के अंधे नाम नैनसुख नहीं हैं तो साफ़ समझ सकते हैं के ये पाकिस्तान की लाइफ लाइन क्यों है ? ये पाकिस्तानी नक्शा, जिसमे के पड़ौसी कब्ज़ाये हुए कश्मीर को अपने वालिद की जागीर
दिखाता है, हमें ये साफ़ बताता है के बाकी कश्मीर पे उसकी नीयत डोलने की असल वजेह क्या है और तमाम ''शामे ग़ज़ल '' और ''शब् ऐ कव्वालियों '' ,जिनके फ्री- पास झांपने के लिए दोनों तरफ़ के लोग काफ़ी बेचैन रहते हैं , से कोई सुधार क्यों नहीं आ सकता । सरकारी खर्चे से लोग पाकिस्तान(जो कि सिर्फ लाहौर होता है ) घूमने के बाद लौटकर लिखते हैं बिल्कुल वही लोग ..,वही खान -पान और वही पहेरना ओढ़ना और तो और वही गालियाँ भी ,हैरत है फिर भी क्यूं लड़ते है? ये पोस्ट उन्हीं के लिए है ।