Showing posts with label IN MY VICINITY. Show all posts
Showing posts with label IN MY VICINITY. Show all posts

Saturday, 28 May 2011

A date with the warriors -2

Even though it was a demonstration and not an actual combat, the hall was packed to capacity and there was cheer and applause on each fall and counter attack.There were many foreigners like me among the spectators and the atmosphere was that of any big sporting event. Aikido is a relatively modern Japanese martial art practised in several countries .Hollywood star Steven Seagal is said to be an expert and has employed the techniques in combat scenes in his films like Under the Siege and Above the Law. Derived from traditional Ju-Jitsu its emphasis is on using the attacker's force against him using very little force of defender . Applying this basic principle even kids can make a grown up attacker run for his life . Unlike Karate, the use of kicks and punches is very minimal or restricted to an extent. Practitioners do not make any sounds like war-cries and they simply twist and turn the arm of the attacker using his energy against him. So enjoy the video and pics as i did the live performance and please answer a simple question . If you are the lucky first u can have a Japanese hand -held fan as a gift from me. The question is-- Name the Indian gentleman who introduced Ju-Jitsu or say Judo in India ? The clue is-- He had a long white beard !

Friday, 22 April 2011

घर से निकलते ही कुछ दूर चलते ही....तोक्योनामा-६


................ एक छोटी से नदी मिलती है (जी हाँ ये नहर नहीं है) जिस पर झुकी हुई साकुरा की शाखें अपनी नर्मो-नाज़ुक पंखुरियाँ  बरसा रही थीं .उस रोज़ पानी में तैरती ये चैरी के फूलों की पंखुरियाँ बड़ी दिलकश मालूम देती थीं सो आपके लिए झटपट ये वीडियो उतार लिया.  .कुदरत अपना कहर बरपाने के बाद  मानो ज़ख्मों पे मरहम लगा रही हो . ये वीडियो कोई दस दिन पहले का है और अब तो यहाँ तोक्यो में बहार अपने उरूज पे है और कहते हैं ये काफी अरसा रहने भी वाली है. जिधर देखिये फूल ही फूल या संतरों से लदी शाखें .ऐसा कोई फूल नहीं जो भारत में न मिलता हो, ऐसी कोई ख़ूबसूरती नहीं जिससे कुदरत ने हिन्दोस्तानियों को मरहूम रखा हो लेकिन जनाब  रख-रखाव भी तो कोई चीज़ है और इस मामले में जापानियों का कोई तोड़ नहीं . एस्थेटिक्स या सौंदर्यशास्त्र की ऐसी समझ और उसपे लोगों की ख़ामोश तबीयत तासीर ....कहना पड़ता है साहेब खुद से ये कहाँ आ गए हम . प्रेम भाव से पूरा विडियो देखें और मेरे लिए कामना, शुभकामना करें प्रभु से  ....हरी ॐ  !


Friday, 29 October 2010

पहाड़ संबंधी कुछ फुटकर , आम-फहम बातें :(२)

पहाड़ संबंधी आम बातों का सिलसिला आगे ले जाते हुए कांव -कांव पब्लिकेशन लिमिटेड के मालिक ब्लौगर 'अपूर्ण' ने अपनी टिप्पणियों के ज़रिये उनमें इज़ाफा किया है -- 1:युवक काम की तलाश में शहरों का रूख करते हैं , और घर पर रहते हैं माँ-बाप, पत्नी , बच्चे | पहाड़ों में बूढ़े, बच्चों और महिलाओं का प्रतिशत युवाओं से कहीं ज्यादा है | एक कहावत , पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के ही काम नहीं आती | 2:आज , पहाड़ी अपनी ही जमीन पर बने होटलों में बैरों का काम करता है | पहले कभी, पहाड़ियों को हमेशा फौज का लोलीपोप चूसने को दिया गया, गोया वे और कुछ नहीं कर सकते हों | 3:हम ११ चचेरे भाइयों में से २ कंप्यूटर प्रोग्रामर हैं | एक पंडिताई का पुश्तैनी राग अलाप रहा है | बाकी ८ या तो होटल में काम करते हैं , या सपना पाल रहे हैं | ये पहाड़ के हर घर की कहानी है | पहाड़ संबंधी मेरा ज्ञान सिर्फ एक यात्री जितना है सो उनकी इन बातों को आपसे साझा करना बनता था यदि पहाड़ संबंधी कुछ और बातें आप यहाँ बांटना चाहें तो स्वागत है

Wednesday, 27 October 2010

पहाड़ संबंधी कुछ फुटकर , आम-फहम बातें

  • "पर्वताःदूरतःरम्या" --इससंस्कृत कहावत का अर्थ है कि पर्वत दूर से ही सुन्दर/रहने योग्य लगते हैं !
  • पहाड़ों में प्रचलित 'रम' नामक पेय मूलतः समुद्री -टापुओं का माल है।
  • भारत में हिमालय से मोहब्बत बँगाली करते हैं और दुनिया में स्केंडिनेवियाई.
  • पहाड़ में सड़कें नेपाली और बिहारी मजदूर बनाते हैं .
  • सब होटलों का मल -मूत्र पवित्र नदियों में गिरता है.
  • ६ ये अब कूड़े के ढेर बनते जा रहे हैं
  • पानी पहाड़ों में दुर्लभ है और यात्री गंद मचाना ,प्रदूषण फैलाना धर्म मानते हैं .
  • वक्त धीरे चलता है वहां इसीलिए कहावत बनी ' पहाड़ जैसा दिन'.
  • पहाडी राज्यों में बहुत से लोग मराठी और राजस्थानी मूल के हैं.
  • १० हिमाचल की बजाय खाना उत्तराखंड का बढ़िया होता है
  • ११ सड़क,सुविधाएं हिमाचल की बढ़िया होती हैं
  • १२ चरस उत्तराखंड में जीवन शैली का का अंग है तो हिमाचल में अंतरराष्ट्रीय व्यापार का ।
  • १३ स्वदेशी शराब बनाने ,पीने का अदब लद्दाख में है
  • १४ पहाड़ में आदमी काम कम करता है , औरत ज़्यादा लेकिन डोगरा, कुमाओं, गढ़वाल, नागा ,लद्दाख स्काउट्स और गुरखा जैसी विश्व स्तरीय रेजीमेंट भी इन पहाड़ों की देन हैं .
  • १५ नेपाल के बाद माओवाद उत्तराखंड को खाने की ताक में है
  • १६ कश्मीर पर चर्चा खर्चा मांगती है !और...
  • १७ जो समाज कश्मीरी पंडितों के निष्कासन पर मौन है वो अवश्यमेव उन्हीं की नियती को प्राप्त होगा ,कल नहीं तो परसों -नरसों .
  • १८ बाई दा वे भारतीय पहाड़ों में सर्व- सुलभ सिगरेट ब्रांड कैप्सटन है .. ......आपका क्या ख्याल है ?

Monday, 5 July 2010

पहाड़ संबंधी कुछ फुटकर बातें

"पर्वताः दूरतः रम्या" --विसर्ग या , सम्बन्धी अशुद्धि के बावजूद इस संस्कृत कहावत का अर्थ है कि पर्वत दूर से ही रमणीय लगते हैं ! कुमाओं और गढ़वाल के ज़्यादातर बाशिंदे मैदानी मूल के हैं ! भारत में हिमालय से सबसे ज़्यादा मोहब्बत बंगाली करते हैं और दुनिया में स्केंडिनेवियाई देशों के । ४ अगर सड़क बनाने वाले बिहारी ,नेपाली मज़दूर हों तो हिमालय में यत्र-तत्र -सर्वत्र बिखरे सब हनीमून होटल बंद हो जाएँ सब होटलों का मल -मूत्र पवित्र नदियों में ही गिरता है देश भर में पहाड़ी इलाकों के कचरा प्रबंधन की कोई सशक्त नीति नहीं है और ये कूड़े के ढेर बनते जा रहे हैं पानी पहाड़ों में दुर्लभ हो रहा है वक्त धीरे चलता है वहां इसीलिए कहावत बनी ' पहाड़ जैसा दिन' । कई जगह पहाड़ों की वीरानगी पागल बना देने वाली होती है १० हिमाचल की बजाय खाना उत्तराखंड का बढ़िया होता है ११ सड़क,सुविधाएं हिमाचल की बढ़िया होती हैं १२ चरस उत्तराखंड में दैनिक जीवन का अंग है तो हिमाचल में अंतर राष्ट्रीय व्यापार १३ शराब पीने का सलीका लद्दाख में है १४ आदमी काम कम करता है चूंकि उसे आदमी नुमा काम कम मिलता है१५ नेपाल के बाद माओवाद उत्तराखंड को खाने की ताक में है । १६ कश्मीर के बारे में बात अब फ़िज़ूल है , सिर्फ लात बहुत मौज़ूं और माकूल है । . ......आपका क्या ख्याल है ?

Monday, 21 June 2010

कभी एक गंभीर ब्लौगर हुआ करता था मैं भी ....

मैंने बतौर ब्लौगर गंभीर विषयों पर लिखने से शुरुआत की , मग़र ब्लौग-जगत का टोटल मिज़ाज और कैफ़ियत टटोलने के बाद अपनी खुशी से यू-ट्यूब पे उतर आया और आज मैं "सफल ब्लौगर''न सही काफी खुश ब्लौगर ज़रूर हूँमैं ब्लौग पे मस्त-मस्त गाने बजाता हूँ और जो ऐसा नहीं करते उनपे तरस खाता हूँ । असल में ब्लौगिंग मनोरंजन के एक नए साधन से बढ़ कर कुछ नहीं और ये प्रिंट की जगह कभी नहीं ले सकती . ज़रा देखिये शुरू में मैं क्या लिखता था ! 'आग का दरिया' शीर्षक से प्रकाशित ये पोस्ट 13 अगस्त ,२००८ की है । मैंने जो तब कहा था वो भारत के रणनीति -विशेषज्ञ अब खुल कर कह रहे हैं ......... 'आग का दरया' ये हमारे यहाँ की मशहूर नाव्लिस्ट कुर्तुलुन आपा के नाविल का भी नाम है जिसे एक ज़माने में गियान पीठ अवार्ड से नवाज़ा गयानाविल में ज़ाहिर है 'आग का दरिया ' एक सिम्बोलिक इमेजेरी है ,मगर एक असल आग का दरया भी है जिसका के नाम दर्याए -सिंध है जो इस नक़्शे में एक नीली लकीर खेंच के दिखाया गया हैअगर आप अक़ल के अंधे नाम नैनसुख नहीं हैं तो साफ़ समझ सकते हैं के ये पाकिस्तान की लाइफ लाइन क्यों है ? ये पाकिस्तानी नक्शा, जिसमे के पड़ौसी कब्ज़ाये हुए कश्मीर को अपने वालिद की जागीर दिखाता है, हमें ये साफ़ बताता है के बाकी कश्मीर पे उसकी नीयत डोलने की असल वजेह क्या है और तमाम ''शामे ग़ज़ल '' और ''शब् कव्वालियों '' ,जिनके फ्री- पास झांपने के लिए दोनों तरफ़ के लोग काफ़ी बेचैन रहते हैं , से कोई सुधार क्यों नहीं सकता । सरकारी खर्चे से लोग पाकिस्तान(जो कि सिर्फ लाहौर होता है ) घूमने के बाद लौटकर लिखते हैं बिल्कुल वही लोग ..,वही खान -पान और वही पहेरना ओढ़ना और तो और वही गालियाँ भी ,हैरत है फिर भी क्यूं लड़ते है? ये पोस्ट उन्हीं के लिए है

Wednesday, 31 March 2010

लस्सी ...लस्सी... !

हूश हरियाणवी बच्चे ,जिनके साथ मैं पला बढ़ा , अक्स़र किसी भी बड़े -छोटे को पकड़ लेते और कहते ''तू कह लस्सी '' या ''ताऊ बोल लस्सी '' और जब वो बोल देता ''लस्सी'' तो जवाब होता ''हत्तेरी नाक में रस्सी '' और फ़िर लस्सी और रस्सी की इस rhyme पर लगता एक पुरज़ोर ठहाका जिसमे दोनों ही पार्टियाँ बराबर की पार्टनर होतीं ।''हल्दी'' ...''तेरा ब्याह जल्दी '' का फार्मूला लड़कियों पे आज़माया जाता बहर हाल , आज भी कभी लस्सी का गिलास देखता हूँ तो लड़कपने का वो मंज़र आंखों के सामने तैर जाता है और लस्सी की वो सोंधी महक और दिलकश ज़ायका भी याद आता है जो कुल्हड़ या कलई वाले पीतल के गिलास की लस्सी में होता था यूं तो लस्सी पाँच सितारा होटल से लेकर छोटी बड़ी दुकानों में आज भी बिकती है मगर नातो वो वैसी दिखती है और ही स्वाद वो रहा हरियाणवी रेफेरेंस में बोलने से ये मतलब लगाया जाए के लस्सी बनाने का कोई ख़ास फन रहा हो वहां हरियाणा की USP है छाछ या मट्ठा लस्सी नफासत मांगती है के कितनी देर उसे बिलोया जाए और मीठा किस मिक्दार में डलेगा और ये फन पुरानी दिल्ली , जयपुर , मथुरा , मेरठ और अमृतसर के पुश्तैनी हलवाइयों के यहाँ आज भी मिल जायेगा मगर ज़रा ढूँढना पड़ेगा , ढूँढने लायक है भी ! साथ में भांग का ठेका भी दिखाई दे तो समझो मंजिले मक़सूद पा ही ली आपने ! चीयर्स !! ''