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Wednesday, 31 March 2010

लस्सी ...लस्सी... !

हूश हरियाणवी बच्चे ,जिनके साथ मैं पला बढ़ा , अक्स़र किसी भी बड़े -छोटे को पकड़ लेते और कहते ''तू कह लस्सी '' या ''ताऊ बोल लस्सी '' और जब वो बोल देता ''लस्सी'' तो जवाब होता ''हत्तेरी नाक में रस्सी '' और फ़िर लस्सी और रस्सी की इस rhyme पर लगता एक पुरज़ोर ठहाका जिसमे दोनों ही पार्टियाँ बराबर की पार्टनर होतीं ।''हल्दी'' ...''तेरा ब्याह जल्दी '' का फार्मूला लड़कियों पे आज़माया जाता बहर हाल , आज भी कभी लस्सी का गिलास देखता हूँ तो लड़कपने का वो मंज़र आंखों के सामने तैर जाता है और लस्सी की वो सोंधी महक और दिलकश ज़ायका भी याद आता है जो कुल्हड़ या कलई वाले पीतल के गिलास की लस्सी में होता था यूं तो लस्सी पाँच सितारा होटल से लेकर छोटी बड़ी दुकानों में आज भी बिकती है मगर नातो वो वैसी दिखती है और ही स्वाद वो रहा हरियाणवी रेफेरेंस में बोलने से ये मतलब लगाया जाए के लस्सी बनाने का कोई ख़ास फन रहा हो वहां हरियाणा की USP है छाछ या मट्ठा लस्सी नफासत मांगती है के कितनी देर उसे बिलोया जाए और मीठा किस मिक्दार में डलेगा और ये फन पुरानी दिल्ली , जयपुर , मथुरा , मेरठ और अमृतसर के पुश्तैनी हलवाइयों के यहाँ आज भी मिल जायेगा मगर ज़रा ढूँढना पड़ेगा , ढूँढने लायक है भी ! साथ में भांग का ठेका भी दिखाई दे तो समझो मंजिले मक़सूद पा ही ली आपने ! चीयर्स !! ''

Saturday, 1 August 2009

भारतीय सेना में आरक्षण : कहिये क्या ख़याल है ?

सरकारी इदारों और तालीमी शोबे में आरक्षण के पैरोकारों से मयखान्वी पूछना चाहता है दोस्तो के हिन्दोस्तानी फौज में आरक्षण की मांग कब उठाई जाने वाली है ? चूंकि ले-दे के जाने कैसे यही एक इदारा है जो समाजी बराबरी के इस लासानी इलाज से महरूम हैयही नहीं वहां अभी तक ऊंचे तबके के लोग ही कमान संभालते आए हैं , अब बताइए इतने बड़े सितम को जाने क्यूं नज़रंदाज़ किया जाता रहा है ? फौज भी तो समाज का अहम् हिस्सा है ! जब डाक्टर और इंजिनियर बनने से , सिविल अफसर बनने से समाजी बराबरी आती है तो कर्नल और जनरल बनने से भी यकीनन आयेगी हीदेश के लिए मरने के मामले में अब मेरिट खत्म करनेपर विचार करने का वक़्त क्या नहीं गया है ? जिस दिन ये सवाल देश के किसी बड़े अखबार के पहले पन्ने पे जगह पा लेगा वो दिन तवारीख़ में दर्ज होने लायक होगा कहिये क्या ख़याल है ?

Tuesday, 8 July 2008

मयखाने में जलबालाएँ या कहिये फिर वही जलपरियाँ

शफ्फाफ परों वाली रहमदिल परियों के किस्से फ़क़त नानी-दादी के किस्सों तक महदूद हैं मगर औरत के धड वाली मछली के क़िस्से तो मर्द जहाज़ी ही हज़ारों बरस से सुनते-सुनाते आए हैं । जलपरी का पहला क़िस्सा ईसा से हज़ार बरस पहले सीरिया की फोक लोर से आया बताया जाता है। आज जलपरी के बारे में जो इमेज मौजूद है वो काफ़ी कुछ हान्स क्रिश्चियन अन्देर्सों नाम के एक डेनिश अफसाना निगार के तसव्वुर की देन है। बहरहाल नेपाल , भूटान और अफगानिस्तान जैसे अभागे , समंदर से कटे हुए मुल्कों के अलावे कोई ऐसा देश नहीं है जहाँ जलपरी के क़िस्से मौजूद न हों । ग्रीक अफसानों में इन्हें सायरन कहा गया है। कहते हैं इन्हें इंसानों से बड़ी मोहब्बत होती हैऔर ये उन्हें अपने साथ पानी के भीतर ले जाने को उतावली होती हैं, मगर इसी चक्कर में इंसानों की जान चली जाती है । ऐसा भी कहा जाता है के ये बहुत अच्छा गाती हैं और जहाज़ियों को लुभा कर उन्हें डुबा डालती हैं । अरब के मल्लाह मानते हैं के अगर समंदर के बीच किसी औरत की आवाज़ में ये सुनाई दे के ''..किनारा आ गया'' तो समझो कोई जलपरी आने वाली मुसीबत से आगाह कर रही है । उधर दिमाग के डाक्टरों की राय ये है के समंदर में नाविकों को महीनों औरतों से दूर रहना पड़ता है इसीलिए जलपरी उनके दिमागी फितूर के सिवा कुछ नहीं। अब जो भी है साहब हम तो जलपरी से खौफ खाते हैं और इसी मारे साहिलों पे जाने से बचते हैं और बस यही मनाया करते हैं के हमारे पहाडी दोस्त अशोक पांडे हमें अब बुलाएँ के तब बुलाएँ । पहाडों पे ऐसी बलाओं के चांस कम ही बताये जाते हैंगे । क्यों जी आपकी क्या राए है ?