यमुना को कृष्ण -
प्रिया कहा गया है । मान्यताओं के अनुसार ये सूर्य की पुत्री और यम तथा शनि की बहिन हैं । जैसे सरस्वती लुप्त हो गयी वैसे ही एक दिन यमुना और फ़िर गंगा लुप्त हो जायेगी ऐसा लिखा बताते हैं । देखा जाए तो ये बस एक नदी है जो उत्तराखंड से निकल कर उत्तर-
प्रदेश के इलाहाबाद में गंगा में मिल जाती है और कल तक तो ये एक राज्य से निकल उसी की एक बड़ी नदी में विलीन हो जाती थी !
फ़िर हज़ारों साल से भारत भर के लोग इसके उदगम पर क्यों आते हैं ?
शायद ये सवाल परेशान करे उनको जो मानते हैं की भारत कभी एक राष्ट्र नहीं था बस छोटे-
छोटे देशों का भू-
भाग था । दक्षिण भारत में भी स्नान करते हुए लोग एक मंत्र के ज़रिये इस नदी को याद करते हैं जैसे यहाँ उत्तर में कृष्णा ,
कावेरी और नर्मदा को करते हैं । इस समय यहाँ गुजरात और बंगाल से आए हुए यात्री ही अधिक थे और दुकानदार हमें भी बंगाल से आया समझ रहे थे और सब्ज़ी में '
झोल'
देने के लिए पूछ रहे थे । यमुनोत्री में एक गर्म जल का शानदार कुंड भी है । इस प्राकृतिक कुंड में नहा कर सारी थकान उतर जाती है और हड्डियाँ ऐसा आराम पाती हैं की क्या कहिये ।
ये मेरी यमुनोत्री की दूसरी यात्रा थी । इस से पहले कोई छः वर्ष हुए तब यहाँ आना हुआ था । तब की तुलना में चढाई का 5
किलो मीटर का रास्ता बहुत साफ़-
सुथरा और पक्का दिखा ,
खड़ी चढाई मगर अब इसे ट्रेक्किंग जैसा नाम नहीं दिया जा सकता । जगह-
जगह बेंच लग गए हैं ,
पीने का पानी भी है । कुछ वर्ष पहले ये १४ किलो मीटर की कठिन चढाई थी अब तो कुछ भी नहीं मगर फ़िर भी अच्छी मशक्कत तो है ही । सरकार ने साफ़ -
सफाई का इन्तज़ाम किया है मगर प्लास्टिक पर कोई बस नहीं । लोग भी समझने को तैयार नहीं सो किया क्या जाए सिवा इसके की इस मुद्दे पे एक अलग पोस्ट छापी जाए मगर फिलहाल बात संत राम भरोसे दास की । नाम के ही अनुरूप राम का भरोसा लिए एक सच्चे संत । आज यमुनोत्री के पट बंद हो गए ,
पण्डे -
पुजारी सब विदा ,
मन्दिर -
दुकानें सब खाली । अब वहां कोई हैं तो बस यही संत । स्थानीय ग्रामीणों का कहना है की सन् ६७ से ये यहीं बिराजते हैं चाहे कितनी बर्फ पड़े या तूफ़ान आयें । उन्हें इस तरह रहते देख अब भक्त जनों ने गुफा को मन्दिर का रूप दे दिया है ,
कुछ कमरे बनवा दिए हैं । न तो किसी को बुलाते हैं ,
न कुछ चढाने को कहते हैं और न ही रत्ती भर अपेक्षा रखते हैं बस हरि भजन करते हैं । बड़ी मुशकिल से फोटो खेंचने दी । ६ साल पहले इस ८४ वर्ष के साधक को मैंने झुर्रियों भरे ,
साँवले से चेहरे के साथ देखा था जबकि अब रंग और त्वचा का रूप बिल्कुल बदला हुआ था । जड़ी -
बूटी का अच्छा ज्ञान रखते हैं और आग्रह करने पर दे भी देते हैं । कभी जाना हो तो दर्शन कर लें ,
चैनल वाले बाबा तो देखते ही रहते हैं । हम एक रात ऊपर रहे और फ़िर जानकी -
चट्टी से बाइक उठा कर घर की राह ली । जो ब्लौगर इस यात्रा-
वृत्त को पढ़े-
पढाएगा उसका कल्याण होगा ऐसा मेरा कुछ-
कुछ मानना है ,
तो गाओ ॐ शांती ॐ........... !