Monday, 23 March 2009

'लापूर शोंसार' मने दुनिया लप्पुझन्ने की !

कोई शरीफ आदमी नहीं चाहेगा के उसे लप्पूझन्ने जैसे शोहदों की कंपनी नसीब हो । मगर इस से पहले के बच्चा आदमी बने सोहबतें उसे चुनती हैं ! यही कबाड़ खाने के प्राप्-रायटर अशोक पांडे के साथ हुआ । बावजूद इसके आदमी बन गए सो उस नैरो -एस्कैप का नोस्टाल्जिया अपने ब्लॉग लप्पुझंना पर यार लोगों से कभी-कभार शेयर किया करते हैं । लप्पू कब आ जाए कोई ठीक नहीं , आए आ जाए नहीं आए तो न आए! ''हम छाले बखत के गुलाम कोई ना हैं ।'' मेरा ख्याल है ऐसा ही कुछ कहता साक्षात् -मूर्तिमान लप्पू । अपनी उम्र से आगे निकल जाने को बेताब इस कान-काटू ,तोतले ,आवारा लौन्डे के ज़रिये एक पूरा ज़माना घूम आते हैं हम । जहाँ एक तीसरी दुनिया के शुमाली कसबे की आपस में मिलती छतें हैं , तांका-झांकी है , परी-रूह चेहरों से कन्धा ही छू जाने की तस्कीन है , मेले-ठेले हैं , कर्नल रंजीत के तलबगार मास्साब हैं , पानी भरने को डामर के ड्रम हैं , ऊर्जस्वी उरोजों की स्वामिनी के कम्बखत पोस्टर भी हैं और साथ-साथ चलती है बड़ों की एक दुनिया जो इन पोस्टों की अंडर-stated हाई - लाईट है । जब बड़ों की दुनिया का कोई ज़िक्र आता है तो लगता है कैमरा बच्चे की आँख से देख रहा हो । ऐसी तमाम खूबियों से लबरेज़ लप्पुझन्ने का चाहने वालों को बेसब्री से इंतज़ार रहता है और क्या ही अच्छा हो ये ज़रा जल्दी -जल्दी आए । इस किताब का कभी तर्जुमा नहीं हो सकता और मेरा ख्याल है 'अनुवाद की सीमायें' पढ़ते वक़्त इस की नज़ीर दी जा सकती है । मुझे अशोक पांडे के ये संस्मरण एक आईदीयल फ़िल्म -मटेरिअल लगते हैं । सत्यजित राय का एक नायक है अप्पू जिस पर तीन फिल्में 'दा अप्पू ट्रिलोजी' के नाम से मशहूर हैं . अप्पू ,लप्पू के बार-अक्स बिल्कुल भोला-भाला बच्चा है जिसकी जर्नी 'अपूर शोंसार' नाम से मशहूर है । मैं नहीं जानता लप्पू की ये जर्नी लेखक के मन में कित्ता रास्ता तय कर चुकी मगर खाहिश है ये चलती रहे और हमें अपने बचपने की याद का स्वाद देती रहे।

5 comments:

  1. मैथिली24 March 2009 at 01:21

    मुनीश साहब, लप्पूझन्ना मुझे बेहद पसंद है, शिकायत ये है कि इसे अशोक जी जल्दी जल्दी नहीं लिखते

    ReplyDelete
  2. मुनीश जी, इस पोस्ट के लिये बहुत बहुत धन्यवाद
    आपके इसरार के कारण आज लफत्तू से फिर मुलाकात हो गई.

    ReplyDelete
  3. मुनीश भाई बचपन के कुछ साल खासी वर्जनाओं के साथ गुजरे पर जिस दिन इन शोहदों की संगत नसीब हुई, समझो उसी दिन आदमी बनने की शुरुआत हुई। असली जिंदगी यही थी और इसके संस्मरणों के रोचक खजानों का किस्सा मेरे भीतर कुलबुलाता रहता है। इसीलिए लप्पूझन्ना के संस्मरण मुझे ठीक अपने लगते हैं।

    ReplyDelete
  4. ahpane ki yaad lappu dilaa jaaye ye to baat hui magar roz ki jugaali ka majaa ahi hota

    ReplyDelete