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Sunday, 25 March 2012

अलविदा ,सायोनारा ऐ ओशिमा !

20 मार्च, 2012

कई रोज़ बाद खुल के धूप खिली है । प्रशांत महासागर और आसमान की नीलिमा आपस में हिली-मिली जाती हैं मानो कहती हों कहाँ पाओगे हमें यूँ फिर से सोच लो अब भी ऐ मुसाफ़िर । लेकिन मुसाफ़िर को तो चले ही जाना है । साहिल पे टहलते हुए देखता है वो एक बच्चा जो दुनिया के हर रंजो-ग़म और डर से परे अपने पिता के साथ गेंद खेलने में मगन है । ये टापू ही उसका घर है । टापू जो 600 मीटर समंदर में डूबा है और साढ़े सात सौ मीटर आसमान में उठा हुआ है । एक ज्वालामुखी पर्वत जो कैमीलिया के सुर्ख लाल फूलों और दहकते शोलों दोनों का घर है । ये जज़ीरा कि ज्वालामुखी ही जिसकी ज़िंदगी है और वही मौत भी । सोचता है मुसाफ़िर कि हमारी भाषा और साहित्य में ये शब्द "ज्वालामुखी" कैसे इतना रच बस गया । हमारे यहाँ तो बस अंडमान द्वीप समूह में एक टापू पे है एक सक्रिय ज्वालामुखी जहाँ लोग आते-जाते भी नहीं । जो चीज़ आस-पास हो ही ना वो कैसे किसी भाषा का हिस्सा हो सकती है । यहाँ तक कि चुटकुलों में भी है मौजूद ... वो कहा है ना पहले दो साल चंद्रमुखी, फिर सूरजमुखी और फिर..और फिर वही ज्वालामुखी । तरल-गरल हलक से उतारा ही है कि सामने पूल के पास एलो वेरा उर्फ़ ग्वारपाठे उर्फ़ घृतकुमारी का एक बड़ा सा झाड़ दीखता है ।बोतल पर लिखे नाम से याद आता है कि एलेक्जेंडर द ग्रेट उर्फ़ सिकंदर महान् की फ़ौजों ने एक दफ़ा क्रेट द्वीपों पे सिर्फ़ इसलिए धावा बोल दिया कि यही एलो वेरा इफ़रात में पैदा हुआ करता था वहाँ जो घावों को जल्द भरने और खूबसूरती बढ़ाने की चीज़ों के अलावा कुछ दीगर मदों में भी इस्तेमाल होता रहा है । मतलब अपने घाव भरने के लिए दूसरों को घाव देना यही है सिकंदर होना, यही है ज़रूरी महान् कहलाने के लिए । लाहौल विला....सिगरेट सुलगा लेता हूँ । हवा तेज़ है झप्प से जल कर खत्म हो जाती है । दूसरी, तीसरी, चौथी ...मैनेजर साहब इशारा करते हैं । इस रिज़ॉर्ट के पीर, बावर्ची , भिश्ती, खर होने के अलावा ड्राइवर भी वही हैं जो मुझे बंदरगाह छोड़ने वाले हैं । किस रोज़ जहाज़ किस बंदरगाह से रवाना होगा ये हवा के रुख पर निर्भर करता है और मोतोमाचि की जगह आज बारी दूसरे पोर्ट की है । गाड़ी में सवार पोर्ट पहुँचता हूँ । अगर बड़ा जहाज़ लूँ तो आठ घंटे और छोटी जैट बोट तो एक घंटा चालीस मिनट । मैनेजर साहब बताते हैं कि इसमें जैट जहाज़ का ही इंजिन लगा है और सी-सिकनेस का भी शुभा नहीं सो यही तय की गई है । बोट रवाना हो चुकी है । अलविदा ऐ ओशिमा, फिर मुलाक़ात हो न हो मग़र इंशाअल्लाह ...हाफ़िज़ खुदा तुम्हारा ।

Saturday, 21 January 2012

हिंदी सभा (जापान) का ऐतिहासिक अधिवेशन सम्पन्न

इक्कीस जनवरी की शाम, तोक्यो का पुराना रिहायशी इलाक़ा निशि ओजिमा रहा गवाह उन ऐतिहासिक पलों का जिन पर कोई भी भारतीय गर्व करेगा । अगले सप्ताह तोक्यो विदेशी भाषा विश्वविद्यालय में होने जा रहे अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन का नेह-निमंत्रण लिए डॉ. सुरेश ऋतुपर्ण स्वयं उपस्थित हुए । जापान में सौ बरस से ऊपर के हिंदी अध्यापन के इतिहास में एक दशक के हिस्सेदार हैं प्रोफ़ेसर सुरेश ऋतुपर्ण । पिछले तीन दशकों से भारत के बाहर हिन्दी की अलख जगाए रखने वाले प्रोफ़ेसर को मयख़ाना सैल्यूट करता है । माँ भारती के परम पुनीत यज्ञ का साक्षी होने का सप्रेम अनुरोध करते हुए प्रोफ़ेसर ऋतुपर्ण ने विश्व-भर से हिंदी मर्मज्ञों के तोक्यो पधारने की पूर्व-सूचना दी और अमर स्वतंत्रता सेनानी रासबिहारी बोस के तोक्यो स्थित समाधिस्थल के दर्शन का आह्वान भी सदस्यों से किया । इस अवसर पर प्रकाशित हो रही दुर्लभ एवम् ऐतिहासिक सामग्री का परिचय हिंदी प्रेमियों को देने के बाद आपने त्रिनिदाद-टोबैगो, फ़िजी एवम् मॉरिशस में हिन्दी के प्रचार-प्रसार की जानकारी भी साझा की । उन्होंने बताया कि इस आयोजन की सफलता के लिए तोक्यो वासी भारतीय समुदाय के हृदय-सम्राट श्री जगमोहन चंद्राणी उनकी हर संभव सहायता कर रहे हैं । सभी सदस्यों ने इस पुनीत कार्य में सहयोग के लिए श्री चंद्राणी जी को धन्यवाद दिया । साथ ही अधिवेशन में उपस्थित थे हिन्दी सभा के संस्थापक सदस्यगण-- रोहन अग्रवाल (इंटेल), प्रोफ़ेसर अखिलेश सुर्जन (संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय, तोक्यो ), राजेश शर्मा 'जापानी' एवम् सुशील गोयल (लेनोवो), संदीप शर्मा ( इंडिया इंटर्नेशनल स्कूल योकोहामा), अजय गौतम( सोनी ) सपरिवार , सॉफ़्टवेयर विज्ञानी तरुण मोहता एवम् चंद्र शेखर पंत (ह्यूलेट-पैकर्ड) ।सभी सदस्यों ने जम कर हिंदी सभा को नई ऊँचाइयों तक ले जाने की वकालत की । साथ ही, नए सदस्यों का स्वागत भी किया गया जिनमें शामिल हैं हिंदी प्रेमी जापानी हिरोशि मात्सुयामा, 15 वर्ष से जापान में रह रहे कावासाकी वासी भारतीय सॉफ़्टवेयर विशेषज्ञ हरीश मनकानी, अयोध्या से जापान पहुँचे अंतर्राष्ट्रीय वित्त प्रबंधन विशेषज्ञ संतोष कुमार पाण्डेय और तोक्यो विश्वविद्यालय में एयरो-स्पेस टैक्नॉलजी के शोधार्थी शशांक खुराना । तोक्यो में कड़ाके की सर्दी और वर्षा के कारण बाल-सभा स्थगित की गई लेकिन उपस्थित बालक वृंद ने साथियों के सानिध्य लाभ का पूरा आनंद लिया । अधिवेशन में सर्व-सम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया कि हिन्दी और जापानी की प्यारी-प्यारी फ़िल्मों का प्रदर्शन हिंदी सभा के नियमित आयोजनों में जगह बना सकता है और इसके लिए आवश्यक प्रेक्षा-गृह एवम् प्रोजैक्टर की व्यवस्था की जानी चाहिए जो इतने सारे सॉफ़्टवेयर विशेषज्ञों की उपस्थिति में कोई कठिन कार्य नहीं है । जापानी फ़िल्मकार अकिरा कुरोसावा की सेवन समुराई का हिंदी की अमर फ़िल्म शोले पर प्रभाव और रोशोमन जैसी फ़िल्मों के निहितार्थ की चर्चा इस अधिवेशन की विशेष उपलब्धि रही । हिन्दी सभा के निष्क्रिय सदस्यों को चेतावनी जारी किए जाने के अलावा बैठक में स्वादिष्ट खान-पान संस्कृति के नितान्त अभाव की चर्चा शून्य काल में सुनाई दी और इन दो विषयों पर आगामी नियमित बैठकों में विस्तार से चर्चा किए जाने के आश्वासन के साथ ही हिंदी सभा जापान का ये यादगार अधिवेशन संपन्न हो गया ।

Sunday, 11 October 2009

दिल्ली-यमुनोत्री मोटर साइकिल अभियान (भाग--४)

यमुनोत्री मार्ग का असल मज़ा बड़कोट और जानकी -चट्टी के बीच है । जानकी -चट्टी से चढाई शुरू होती है सो उसका अलग अनुभव है मगर प्राकृतिक -सुषमा का जो आनंद इस मार्ग में है उसका वर्णन क्या किया जाए बस चित्र देख कर ही आप समझ जायेंगे ! करीब ४० किलोमीटर का ये फासला बड़े मज़े से रुकते -रुकाते पूरा किया । उस दिन दो अक्टूबर का दिन था और इस सुदूर अंचल में महात्मा गांधी की जय बोलते बच्चे बड़े प्यारे लग रहे थे सो उनका एक छोटा सा विडियो भी हमने उतार लिया । आने वाली सर्दी की तय्यारी में आलू इकठ्ठे करते और सब्ज़ी सुखा कर रखते ग्रामीण यूँ ही हाथ उठा कर जय राम जी की बोल देते तो दिल भर आता कि हम आख़िर इनके क्या लगते हैं ! प्रकृति के सान्निध्य ने इनके हृदय शुष्क नहीं होने दिए हैं . पुण्य-सलिला यमुना के उदगम के निकट वर्ती ग्रामीणों को मैं नमस्कार करता हूँ ,वंदन करता हूँ देवभूमि उत्तराखंड का और मनाता हूँ के इसे किसी की नज़र न लग जाए ।

Friday, 9 October 2009

दिल्ली-यमुनोत्री मोटर साइकिल अभियान ; ( 3)

"मौज दो ,मौज लो ,न मिले तो खोज लो " के स्वतः -स्फूर्त सिद्धांत का अनुगमन करती हमारी फट-फटिया ८०-९० की रफ़्तार से भागी जा रही थी ,मगर कालसी के बाद चढाई शुरू हुई तो गति धीमी कर लेनी पड़ी यही कोई २५-३० के आस-पास ! हर मोड़ हैरान कर देने वाला था . कहीं बीच सड़क पे झरने झर रहे थे तो कहीं अचानक गूजरों की टोलियाँ नमूदार हो जाती . अपनी भैंस और बकरियों को चराते ये गूजर सड़क के बीचों बीच पसरने से भी परहेज़ नहीं करते और आने-जाने वालों की जान सांसत में डाले रहते हैं। । बहरहाल, गूजर बालक फुंदने वाली टोपियाँ पहने फुदकते बड़े भले मालूम देते थे . हिमाचल प्रदेश की तुलना में उत्तराखंड की कानून -व्यवस्था निस्संदेह लचर है चूंकि सड़क के किनारे से गुज़रती प्रत्येक नवयुवती गंडासा या दरांती लिए ही दिखाई देती थी । गंगोत्री और बद्रीनाथ के उलट यमुनोत्री -मार्ग का कोई रण-नीतिक महत्त्व नहीं है और इसीलिए उसकी हालत भी लचर है मगर कुदरती नज़ारों के आगे सारी शिकायतें बेकार मालूम देती थीं . बेशक सड़क को कई जगह से दुरुस्त भी किया जा रहा था मगर इस से रास्ता और संकरा हो गया था .ज़्यादा धचके लगने से बाइक का एक सामने का शौकर जवाब दे चुका था और पीछे टंगा बैग टायर से रगड़ खाकर किनारे से कुछ फटने लगा था ।डाक- पत्थर,कालसी जुड्दो , नैनबाग, नैनगांव, दामता, कुआँ और नौगाँव से होते हम बड़कोट पहुँच चुके थे । जहाँ पहले दिन हमने आराम से ३०० किलोमीटर से कुछ ऊपर बाइक खेंच ली वहीं आज १०० किलोमीटर में ही पिछवाड़े की चूलें हिलने लगीं सो बाइक रोक कर गढ़वाल मंडल विकास निगम का कमरा कब्ज़ाया गया । यहाँ रेट १५० रूपइए मात्र प्रति बिस्तर था जो किसी फाइव स्टार के १५,००० वाले बिस्तरे से भी ज़्यादा गुदगुदा और आरामदेह था ! रात यहीं बिताने की ठहर हुई और बैग को अगली सुबह की खातिर ठीक से बाँध कर छोड़ दिया ! see video also.