एक विशाल , खिलखिलाते बाज़ार की इस भाषा को फलने-फूलने से कोई माई का लाल रोक नहीं सकता . दिल्ली और मुम्बई में हज़ारों रुपये प्रति घंटे देकर हिंदी सीखने वाले विदेशी भी हैं । बकौल हिंदुस्तान टाइम्स कटरीना कैफ ने २२,००० रुपय्ये प्रति घंटे देकर हिंदी सीखी ! मगर , हिंदी दिवस , हिंदी पखवाड़े और हिंदी माह को जाने क्या सोच - समझ कर ऐसे मौके पे तय पाया गया है जब हिंदी बोलने और नहीं भी बोलने वाले दोनों किस्म के हिन्दू अपने-अपने पुरखों के श्राद्ध-कर्म को अंजाम दे रहे होते हैं या देने की तय्यारी में होते हैं . लगे हाथों हिंदी का भी तर्पण हो जाया करता है :) वर्ना इस मुबारक मौके पे होने वाली किसी संगोष्ठी में कभी तो ये विचार किया गया होता कि हिंदी को सही मायने में लोकप्रिय बनाने वाले हिंदी सिनेमा के तमाम समारोह अंग्रेजी में ही क्यों होते हैं या हिंदी में बनी ९९ .९ फ़ीसदी फिल्मों के कास्टिंग -टाइटिल भी आज तक अंग्रेजी में ही क्यों दिखलाए जाते हैं ? या कॉमन -वेल्थ खेलों का साला एक भी बोर्ड हिंदी में क्यों नहीं है ?दरअसल , एक बाज़ार की भाषा के तौर पे तेज़ी से आगे बढ़ रही हिंदी राष्ट्रीय गर्व की भाषा बनने से अभी भी दूर है और आज की पीढी के बहुत से युवा तो रोमन लिपि में हिंदी लिखते दिखाई देते हैं . बहरहाल, देव नागरी को मुख्य धारा में बनाये रखने की मुहिम में हिंदी -ब्लौगिंग का वही योगदान है जो बोलचाल की हिंदी को इज़्ज़त बख्शने में श्री अमिताभ बच्चन का है ! मैं दोनों का इस खुशनुमा मौके पे तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ . आमीन !