Sunday, 6 November 2016

दूषित कविता

चिड़ी के ग़ुलाम
हुकुम के अट्ठे
उल्लू के पट्ठे
कह रहे हैं कि:
आपात्काल चल रहा है !
राष्ट्रचीते ,
कचिया पपीते
बारूद के पलीते
कह रहे हैं कि:
मधुमास चल रहा है !
मैं बोल पा रहा हूँ कि:
बस श्वास चल रहा है !
ये प्रदूषण मुझको खल रहा है ।
ये हरामी शहर दरअस्ल जल रहा है

# प्रदूषित कविता


  1. आज सलिल वर्मा जी ले कर आयें हैं ब्लॉग बुलेटिन की १५०० वीं पोस्ट ... तो पढ़ना न भूलें ...

    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है - १५०० वीं ब्लॉग-बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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